Pran Shakti Ek Divya Vibhuti
PANCHKOSH SADHNA – Online Global Class – 18 June 2022 (5:00 am to 06:30 am) – Pragyakunj Sasaram _ प्रशिक्षक श्री लाल बिहारी सिंह
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।
SUBJECT: प्राण शक्ति एक दिव्य विभूति
Broadcasting: आ॰ अमन जी/ आ॰ अंकुर जी/ आ॰ नितिन जी
शिक्षक बैंच: आ॰ सुभाष चन्द्र सिंह (गाजियाबाद, उ॰ प्र॰)
गायत्री मंजरी (गायत्री महाविज्ञान – तृतीय भाग) – http://literature.awgp.org/book/Super_Science_of_Gayatri/v10.43 में प्राणमयकोश हेतु तीन सुत्र ~ मंत्र संख्यां 19, 20 & 21
प्राण शक्ति से मनुष्यों का ऐश्वर्य, पुरूषार्थ, तेज, ओज व यश निश्चय ही बढ़ते हैं ।
पांच महाप्राण और पांच लघुप्राण इन दस से उत्तम प्राणमयकोश बना है ।
बन्ध, मुद्रा व प्राणायाम द्वारा यत्नशील पुरुष को यह प्राणमय कोश सिद्ध होता है ।
पांच महाप्राण और पांच लघुप्राण – http://literature.awgp.org/book/Gayatree_kee_panchakoshee_sadhana/v7.77
बन्ध – http://literature.awgp.org/book/Gayatree_kee_panchakoshee_sadhana/v7.78
मुद्रा – http://literature.awgp.org/book/Super_Science_of_Gayatri/v10.12
प्राणायाम – http://literature.awgp.org/book/Super_Science_of_Gayatri/v10.13
प्राणायाम चिकित्सा से मनोविकार का उपचार – http://literature.awgp.org/book/Pranayam_Se_Aadhi_Vyadhi_Niwaran/v1.32
प्राणायाम हेतु आदर्श स्थिति:-
स्थान – स्वच्छ, हवादार, शान्तिमय व पवित्र ।
आसन – सुखासन, सिद्धासन, वज्रासन आदि ।
शारीरिक स्थिति – मलाशय, अमाशय, मुत्राशय खाली ।
मानसिक स्थिति – वासना, तृष्णा, अहंता व उद्विग्नता – शांत ।
क्रिया – “पूरक + अंतः-कुंभक + रेचक + बाह्य-कुंभक”
शैली – भाव (श्रद्धा + प्रज्ञा + निष्ठा) युक्त ।
समय – जब तक अच्छा लगे ।
आहार विहार – सादा भोजन उच्च विचार ।
प्राण शक्ति से अतीन्द्रिय दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है ।
(छान्दोग्योपनिषद्) प्राण को ज्येष्ठ व श्रेष्ठ कहा गया है (प्राणो या वा ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च) ।
पंचकोश में प्राण :-
अन्नमयकोश में प्राणाग्नि
प्राणमयकोश में जीवाग्नि
मनोमयकोश में योगाग्नि
विज्ञानमयकोश में आत्माग्नि
आनंदमयकोश में ब्रह्माग्नि
(शतपथ – प्राणा वा ऋषय ।) प्राण ही ऋषि है ।
प्राण शब्द का अर्थ चेतना शक्ति होती है । प्राण आत्मा का गुण है । वह परम आत्मा से निसृत होता है ।
(प्रश्नोपनिषद्) परमात्मा ने सर्वप्रथम प्राण उत्पन्न किया । प्राण से श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज़, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन व अन्न आदि बनें ।
भौतिक विज्ञान – जड़ से चेतन उत्पन्न की बात करता है जबकि आत्मविज्ञान – चेतन से जड़ उत्पन्न की ।
यह प्राण मन व इन्द्रियों से भिन्न है । अतः प्राणायाम को केवल breathing exercises भर ना समझा जाए प्रत्युत् व्यष्टि को समष्टि में ‘योग’ कर दिव्य विभूतियों (ओजस् + तेजस् + वर्चस्) का स्वामी बना जाए ।
जिज्ञासा समाधान
प्राणमयकोश सिद्धि के parameters – ऐश्वर्य, पुरूषार्थ, तेज, ओज व यश । इसकी पूर्णता व्यक्तित्व के अंदर निःस्वार्थ प्रेम/ आत्मीयता रूपेण परिलक्षित होती है ।
Concept समझने के लिए theory (मंत्र) आवश्यक – ‘approached’ (उपासना – उत्कृष्ट चिंतन @ज्ञानयोग) ।
Concept clear (theory सिद्ध) होने के उपरांत habbit/चरित्र में रचाने पचाने बसाने हेतु ‘practical‘ (क्रियायोग) की आवश्यकता – ‘digested’ (साधना – आदर्श चरित्र @ कर्मयोग) ।
Theory & Practical सिद्ध (mature) होने के उपरांत ‘application‘ (सेवा/ निःस्वार्थ प्रेम) – ‘realised’ (अराधना – शालीन व्यवहार @ भक्तियोग) ।
भावनाशील बनें । (कर्मयोग) श्रम देवता की अराधना से आंसू को पसीने का भी रूप दिया जा सकता है । आंसू, ‘व्यथा’ के ना हों प्रत्युत् ‘आनंद’ (श्रद्धा/ करूणा) के हों तो आंसू भी अच्छे हैं ।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ।।
Writer: Vishnu Anand
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