Brihdaranyak Upnishad (बृहदारण्यक उपनिषद) – 1
PANCHKOSH SADHNA ~ नवरात्रि साधना सत्र – Online Global Class – 17 Oct 2020 (5:00 am to 06:30 am) – Pragyakunj Sasaram – प्रशिक्षक Shri Lal Bihari Singh
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्|
Please refer to the video uploaded on youtube.
sᴜʙᴊᴇᴄᴛ. बृहदारण्यक उपनिषद्
Broadcasting. आ॰ अमन जी
श्रद्धेय लाल बिहारी बाबूजी
दुर्गा सप्तशती. यह मार्कण्डेय पुराण का अंश है, जिसमें 700 श्लोक हैं। इसका एक नाम देवीमाहात्म्यम् (देवी का महात्म्य) है।
प्रथम ब्राह्मण. ‘सृष्टि रूप यज्ञ’ @ अश्वमेध यज्ञ के विराट अश्व। विराट प्रकृति की उपासना द्वारा ‘ब्रह्म’ की उपासना।
पुरुष सूक्त – ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल का एक प्रमुख सूक्त यानि मंत्र संग्रह (10.90) है, जिसमें एक विराट पुरुष की चर्चा हुई है और उसके अंगों का वर्णन है।
यज्ञीय अश्व/ विश्वव्यापी शक्ति प्रवाह का सिर ‘उषाकाल’, आदित्य (सूर्य) – नेत्र, वायु – प्राण, खुला मुख – आत्मा, अन्तरिक्ष – उदर, दिन व रात्रि – दोनों पैर, नक्षत्र समूह – अस्थियां हैं, आकाश – मांस, मेघों का गर्जन – अंगड़ाई, जल-वर्षा – मूत्र, व शब्द घोष – वाणी है। ये अलंकारिकता/ उपमाएं – विराट सृष्टि का बोध कराती हैं अर्थात् ऋषि सत्ताएं – मूर्त प्रतीकों के माध्यम से अमूर्त ब्रह्म की विराट संचेतना का दिग्दर्शन कराते है।
देवगण संख्या में कम व असुरगण अधिक। दोनों में प्रतिस्पर्द्धा हुई। देवतागण यज्ञ में ‘उद्गीथ‘ (प्राण का उर्ध्वगमन) द्वारा असुरों पर हावी होने का विचार करके – “वाक्, प्राण, चक्षु, कान, मन, मुख प्राण आदि” से उद्गीथ पाठ करने का निवेदन किया। सभी ने देवताओं के लिए ‘उद्गीथ’ किया, परन्तु असुरगणों ने उन्हें पाप से युक्त किया अर्थात् “वाणी, प्राण-शक्ति, चक्षु, कान, मन आदि” को दूषित हो गये। किन्तु मुख में निवास करने वाले प्राण अर्थात् मुख्य प्राण को वे दूषित नहीं कर सके। वहां असुरगण पूरी तरह पराजित हो गये। इस मुख (मस्तिष्क मध्य – मुख्य प्राण का स्थान @ सुषुम्ना) में समस्त अंगों का रस होने के कारण इसे ‘आंगिरस‘ भी कहा जाता है। इस प्राण-रूप देवता ने इन्द्रियों के समस्त पापों को नष्ट करके उन्हें शरीर की सीमा से बाहर कर दिया। तब उस प्राणदेवता ने वाग्देवता (वाणी), चक्षु, घ्राण-शक्ति, श्रवण-शक्ति, मन-शक्ति आदि से मृत्यु-भय को दूर कर दिया और फिर प्राण-शक्ति को भी मृत्यु-भय से दूर कर दिया। विज्ञानमयकोश में सुषुम्ना @ साक्षी भाव @ स्थित प्रज्ञ की ही साधना की जाती है।
समस्त देवगण – प्राण में प्रवेश कर गये और अभय हो गये। यह प्राण ही ‘साम’ है। वाक् ही ‘सा’ और प्राण ही ‘अम’ है। दोनों के सहयोग से ‘साम’ बनता है।
मैथुनी सृष्टि @ अर्द्ध नारीश्वर से जीवन के विविध रूपों का जन्म हुआ। सबसे पहले ब्रह्म – ‘ब्राह्मण’ वर्ण में, पुन: अपनी रक्षा के लिए – क्षत्रिय वर्ण, फिर उसने वैश्य वर्ण का सृजन किया व अन्त में शूद्र वर्ण का सृजन किया। ब्रह्म ही सर्वव्यापक हैं व चारों वर्ण विभूतियां हैं।
धरती से उत्पन्न अन्न – सभी को समान रूप से उपभोग करने का अधिकार, हवन द्वारा दया जाने अन्न देवताओं हेतु व पशुओं को दिया जाने वाला खाद्यान्न दूध (पोषक प्रवाह) उत्पन्न करता है।
उस पुरुष ने तीन अन्नों ‘मन, वाणी व प्राण‘ का चयन स्वयं किया है। वाणी द्वारा पृथ्वी लोक को, मन द्वारा अन्तरिक्ष लोक को व प्राण द्वारा स्वर्ग लोक को पाया जा सकता है। वाणी – ॠग्वेद, मन – यजुर्वेद व प्राण – सामवेद है। इस विश्व में जो कुछ भी स्वाध्याय @ ज्ञान है, वह सब ब्रह्म से ही एकीकृत है।
षष्ठम ब्राह्मण. नाम रूप व कर्म।
प्रश्नोत्तरी सेशन
नवरात्रि साधना में ‘निरोगी तन-मन, सौजन्य युक्त पराक्रम, स्वाध्यायशील, आत्मीयता, भाव संवेदना (निःस्वार्थ प्रेम) व अखंडानंद आदि’ को धारण करें।
त्रिपुटी में आत्मसत्ता का ध्यान ही त्रिपुटी में ॐ का ध्यान है।
भावनाओं में प्रज्ञा का समावेश – भाव संवेदना। भावनाओं पर विवेक का नियंत्रण हों तो भावनाएं कभी भी दुःख कारक नहीं हो सकती।
जब स्वयं के प्रति – आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई भावना/ मान्यता विद्यमान हो तो वही जीव संज्ञक होकर जीवात्मा कही जाती है। प्रकटीकरण को जन्म और लुप्त को मरण की संज्ञा दी जाती है। आत्मा जन्म व मरण से परे हैं।
मंत्र लेखन से बहुत लाभ मिलता है। ध्यान में मन भटकता है तो जहां कहीं भी मन जाए वहां ईश्वरीय चिंतन, मनन व निदिध्यासन किया जा सकता है।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।
Writer: Vishnu Anand
No Comments