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Gayatri Geeta (गायत्री गीता)

Gayatri Geeta (गायत्री गीता)

🌕 PANCHKOSH SADHNA ~ Online Global Class – 22 Aug 2020 (5:00 am to 06:30 am) – प्रज्ञाकुंज सासाराम – प्रशिक्षक श्री लाल बिहारी सिंह.

ॐ भूर्भुवः स्‍वः तत्‍सवितुर्वरेण्‍यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्‌|

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sᴜʙᴊᴇᴄᴛ. गायत्री गीता

Broadcasting. आ॰ अमन कुमार

🌞 आ॰ श्री सुभाष चन्द्र सिंह (गाजियाबाद, उ॰ प्र॰).

कामधेनु रूपी उपनिषद् का दूध गीता है जिसे परम चेतना रूपी कृष्ण दूह रहे हैं। सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।।

गायत्री – गीतां ह्योतां यो नरो वेत्ति तत्तवतः। स मुक्तवा सर्वेदुः खेभ्यः सदानन्दे निमज्जति ।।१४।।
अर्थ – जो मनुष्य इस गायत्री गीता को भली प्रकार जान लेता है वह सब प्रकार के दुःखों से छूटकर सदा आनन्दमग्न रहता है।

सांख्य दर्शन के प्रथम सुत्र में त्रिविध दुःखों से निवृत्ति को मोक्ष कहा गया है।
योग दर्शन के प्रथम सुत्र में अथ‌ योगानुशासनं अर्थात् आत्मानुशासन को धारण करने पर ही योग पथ पर आरूढ़ हो सकते हैं। द्वितीय सुत्र योगश्चवृत्ति निरोधः – चित्त वृत्तियों का निरोध योग है।

– परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ स्वघोषित नाम। जिसे वेद न्यायकारी, सच्चिदानन्द, समदर्शी, नियामक, प्रभु और निराकार, संपूर्ण विश्व की आत्मा आदि अनंत नामों से जाना जाते हैं।
क्रियायोग – हमें इन नामों में समाहित तत्त्व दर्शन‌ को जानने, समझने व जीने से ही मुक्ति मिलती है।

भूः – प्राणस्वरूप। सभी मानव और प्राणियों को अपने समान ही देखना चाहिए @ आत्मवत् सर्वभूतेषु। अभेद दर्शनं ज्ञानं।
क्रियायोग (Practical) – सोऽहं साधना @ उपासना @ भक्तियोग।

भुवः – दुःख नाशक। कर्त्तव्य परायणता। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन @ कृतिकर्म – हमें कर्तव्य भावना से कर्म करना चाहिए।
क्रियायोग – निष्काम कर्म @ कर्मयोग।

स्वः – स्थित प्रज्ञता @ स्थिरता @ स्वस्थ व संतुलित मन। हमें मन को वश में करने हेतु प्रयत्नशील रहना चाहिए। सत्य में निमग्न रहें।
क्रियायोग – “जप, ध्यान, त्राटक व तन्मात्रा साधना” @ योगश्चित्तवृत्ति निरोधः @ अभ्यास व वैराग्य @ ज्ञानयोग।

तत् – तत्त्व दर्शन @ जन्म मरण के रहस्य का ज्ञाता। हमें निर्भय व अनासक्त जीवन जीना चाहिए।
क्रियायोग – शरीर को भगवान का मंदिर मानकर उसकी उचित रक्षा करें और आत्मा के स्वार्थ – परमार्थ में संलग्न रहें।

सवितुः – तेजस्विता। हमें सविता के तरह बलवान होना चाहिए। सविता सारे सूर्यों का प्रसव करती हैं।
क्रियायोग – ओजस् तेजस् व वर्चस् की साधना।

वरेण्यं – श्रेष्ठता। हमें श्रेष्ठ देखना, श्रेष्ठ चिंतन करना, श्रेष्ठ विचारणा व श्रेष्ठ कार्य करना चाहिए।
क्रियायोग – स्वाध्याय, सत्संग व सद्कर्म।

भर्गो – निष्पाप। हमें पापों से बचना चाहिए।
क्रियायोग – तपश्चर्या @ प्रत्याहार।

देवस्य – देवत्व। हमें देवत्व संवर्द्धन/ अवतरण @ सद्गुणों को धारण करना चाहिए।
क्रियायोग – ध्यान – धारणा।

धीमहि – पवित्रता। हम अंतरंग व बहिरंग पवित्रता को धारण करें।
क्रियायोग – शुचिता @ अंतरंग व्यवस्थित – बहिरंग सुव्यवस्थित।

धियो – सद्बुद्धि @ प्रज्ञा। हम प्रज्ञा को धारण करें।
क्रियायोग – स्वाध्याय (अध्ययन + चिंतन + मनन + निदिध्यासन)।

यो नः – परमार्थ। अर्जित सम्पदा का सदुपयोग अर्थात् स्वयं की आवश्यकताओं को कम करे और परमार्थरत् रहें।
क्रियायोग – अर्जन तप व कर्षण तप।

प्रचोदयात् – सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा। हम प्रेरणाओं को धारण करें और प्रसारण का माध्यम बनें।
क्रियायोग – सद्ज्ञान + सत्कर्म @ “उपासना, साधना व अराधना”।

प्रश्नोत्तरी with Subhash Chand भैया
पवित्रता के अभिवृद्धि के लिए अकर्तापन का भाव रखें। परम चेतना सब कुछ करते हुए कुछ अभिव्यक्त नहीं करती है अतः आ॰ भैया ने इस हेतु मौन‌ तप को धारण किया है।

🌞 श्रद्धेय श्री लाल बिहारी सिंह @ बाबूजी & प्रश्नोत्तरी

आ॰ सुभाष चन्द्र जी की दिव्य प्रखर प्रज्ञा बुद्धि को नमन है @ उत्कृष्ट स्तर के प्रवक्ता।

पवित्रता @ शुचिता की उभयपक्षीय प्रक्रिया में अंतरंग और बहिरंग पवित्रता दोनों आते हैं। शारीरिक पवित्रता/ सुंदरता/ सुघरता के संग मानसिक पवित्रता/ संतुलन/ विवेक का ध्यान रखें।

“भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्” – ये चेतना के सात लोक हैं। गायत्री हृदयम का स्वाध्याय किया जा सकता है।

परमात्मा का एक नाम अनंत भी है। अनंत चतुर्दशी के पावन पर्व पर हम गायत्री गीता के तत्त्व दर्शन‌ के प्रेरणाओं को धारण व प्रसारण कर आनन्दमग्न रह सकते हैं।

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ||

Writer: Vishnu Anand

 

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