Meditation Science and Self refinement
🌕 PANCHKOSH SADHNA ~ Online Global Class – 25 Jul 2020 (5:00 am to 06:30 am) – प्रज्ञाकुंज सासाराम – प्रशिक्षक Shri Lal Bihari Singh @ बाबूजी
🙏ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्|
📽 Please refer to the recorded video. https://youtu.be/CuUEZyLk4VQ
📔 sᴜʙᴊᴇᴄᴛ. मनोमय कोश – 1. ध्यान का वैज्ञानिक पक्ष & 2. मानसिक परिष्कार में ध्यान की भूमिका
📡 Broadcasting. आ॰ अमन कुमार/आ॰ अंकुर सक्सेना जी
🌞 1. आ० गोकुल मुन्द्रा जी (कलकत्ता, पं० बं०)
🌸 मन का संपूर्ण शरीर पर साम्राज्य है। बालपन से वयोवृद्ध अवस्था तक मन अपने स्वरूप (आयामों) का विस्तार करता रहता है।
🌸 मन को एकाग्र करने के लिए ध्यान की आवश्यकता होती है। ध्यान से पढ़ना, ध्यान से चलना, ध्यान से जाना, ध्यान से ……!
🌸 ध्यान की प्रथम अवस्था को हम एकाग्रता के रूप में हम समझ सकते हैं। एकाग्रता संपादन ध्यान का प्रत्यक्ष लाभ है। एकाग्रता से बिखराव सिमटता है, शक्ति उत्पन्न होती है।
🌸 ध्यान की अगली भूमिका हमें तन्मयता के रूप में मिलती है।
🌸 ध्यान से हमें ना केवल भौतिक सफलताएं मिलती हैं वरन् आत्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।
शरीरगत संयम रहने से मनुष्य स्वस्थ व दीर्घायु होता है। उसी प्रकार मनोगत संयम @ ध्यान – एकाग्र भाव संपादित करने से बुद्धिमान, विचारक व मनीषियों की श्रेणी में जा पहुंचता है।
🌸 ध्यानयोग का मुख्य उद्देश्य मस्तिष्कीय बिखराव को रोक कर एक चिंतन बिंदु पर केंद्रित कर सकने की प्रवीणता प्राप्त करना है। इस प्रयोग पर जो जितना सफल होता है उसके अन्तःचेतना में उसी अनुपात में प्रचंड बेधक शक्ति उत्पन्न होती है।
🌸 “जड़ – चेतन, परा – अपरा, विद्या – अविद्या, संभूति – असंभूति, पंचकोश साधना – कुण्डलिनी जागरण” साधनात्मक युग्म को साथ साथ लेकर चलने से बात बनती है। ब्रह्मवर्चस साधना ~ ब्रह्म अर्थात् गायत्री + वर्चस अर्थात् सावित्री साधना।
🌸 “आत्म संतोष, दैवीय अनुग्रह व लोक सम्मान” साधना के तीन लाभ हैं जिसकी उपलब्धि हर एक साधक को निश्चित रूप से होती है।
🌸 पंचकोशी क्रियायोग. क्रिया – योग तब बनती है जब क्रिया – ध्यानपरक हो अर्थात् क्रिया के संग ध्यान जुड़ जाये।पांचों शरीर को प्रत्येक क्षण हम ध्यान के माध्यम से प्राणवान बना सकते हैं।
🌸 अन्नमयकोश साधना में “आसन, उपवास, तपश्चर्या व तत्वशुद्धि” में ध्यान ही भौतिक लाभों की पूर्णता आध्यात्मिकता की ओर ले जाता है।
🌸 प्राणमयकोश साधना (प्राणायाम, मुद्रा व बंध) की उपलब्धियों में आदरणीय ने “प्रतिभा, पराक्रम व साहस” के रूप में जीवन के बाह्य व आंतरिक स्वरूपों में समझाया है।
🌸 मनोमयकोश (जप, ध्यान, त्राटक व तन्मात्रा साधना) की साधना की उपलब्धियों में आदरणीय ने वेदमाता गायत्री की प्रतीकात्मक मूर्ति में सवारी हंस के गुण ~ नीर-क्षीर पृथक-पृथक करने की कला @ विवेक का विवेचन किया है।
🌸 नव सृष्टि निर्माण के प्रसव काल पीड़ा के स्वरूप में आदरणीय ने वर्तमान चुनौतियों को समझाया है। हम सौभाग्यशाली हैं की हम युग निर्माण के प्रतिभागी हैं … साक्षी हैं ….।
🌸 विज्ञानमयकोश की साधना (सोऽहं, आत्मानुभूति, सर्वर संयम व ग्रंथि भेदन) में आदरणीय ने ज्ञान की विशिष्टता @ परिपक्वता @ संपूर्ण रूप से जान लेना – समझ लेना है। श्रद्धा, भक्ति, सहृदयता जागरण।
🙏 आनंदमयकोश साधना (नाद, बिन्दु, कला व तुरीय साधना) की उपलब्धि आत्मसाक्षात्कार, ईश्वर दर्शन व अखंडानंद के रूप में मिलती है। अज्ञान, अंधकार, दुःख आदि की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होती है – ज्ञान का अभाव अज्ञान, प्रकाश का अभाव अंधकार व आनन्द का अभाव दुःख है।
🌞 आ॰ वीणू शर्मा दीदी . दीदी की उम्र 45 वर्ष है वह नियमित रूप से प्रतिदिन 10 मिनट शीर्षासन का अभ्यास करती हैं। शरीर हल्का हो गया है व ध्यान स्वयमेव प्रस्फुटित होता है।
🌞 Q & A with Shri LB Singh.
🙏 आदरणीय गोकुल भैया के संभाषण/ शिक्षण में उनके अनुभवों की परिपक्वता दिखती है – सादर नमन।
🙏 शीर्षासन में तीनों बंध (मूल, उड्डियान व जालंधर बंध) स्वमेव लगते हैं। इसके शारीरिक व चेतनात्मक दोनों लाभ होते हैं। अतः एनाटॉमी के साथ चक्रों व उपचक्रों का ध्यान किया जा सकता है। ध्यान की परिपक्वता साधक की सहजता व ज्ञान पर निर्भर करता है। ध्यान की कोई limitations नहीं होती है यह सहज समाधि @ असीम आनन्द का बोधत्व करातीं हैं।
शीर्षासन के अभ्यास से पहले गर्दन में पर्याप्त सामर्थ्य विकसित कर लेनी चाहिए। सात्त्विक आहार विहार रखकर शारीरिक लोच व मानसिक एकाग्रता से शीर्षासन के लाभ बढ़ते जाते हैं।
सहजता का ध्यान रखते हुए सभी परिजन इसका अभ्यास कर सकते हैं।
🙏 प्राण @ ऊर्जा का स्वरूप हमारे मनःस्थिति/ उद्देश्य पर निर्भर करता है। हमें रूपांतरण करना होता है।
🐵 गुरुदेव कहते हैं कि – हमारा परिष्कृत रूप भगवान हैं।
🙏 वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य अपनी भावना, विचारणा व मनःस्थिति के अनुरूप विभिन्न प्रकार की ऊर्जा धारायें प्रस्फुटित करता है। यह मस्तिष्कीय धारायें ४ भागों में बंटी हैं – अल्फा, बीटा, थीटा व डेल्टा; जिसे EEG machine के द्वारा मापा जाता है। आंइन्साटाईन अल्फा स्टेट में रहते थे – ‘एकाग्रता – तन्मयता – तत्परता‘ उनके जीवन का अंग बन गयी थीं।
🙏 ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ||
🙏Writer: Vishnu Anand 🕉
Comments: 2
🙏 अपनों से अपनी बात. ध्यान ..
✍ बाल्यकाल से अनुशासन व शिक्षण पारंपरिक विरासत में परिवार जनों के आशीर्वाद से मिली।
ध्यान – बाह्य जीवन में निरत रहा किंतु अपने भीतर जाने हेतु पुरूषार्थ ना कर पाने की वजह से मन सांसारिक थपेड़ों में से लहुलुहान होता रहा। बाह्य जगत में धर्म तंत्र के कथित प्रचारक व्यक्ति विशेष व मानव समुदाय के “मनसा – वाचेण – कर्मणा” एकरूपता ना देख कर मन आंदोलित होता रहता।
❤️ इन सभी के बीच गुरूसत्ता के क्रांति धर्मी साहित्य ना केवल मरहम बनते वरन् प्राण का संचार करते।
💡 दुर्घटना के पश्चात् जब शारीरिक व मानसिक बल टूटा तब गुरूवर के प्रति पूर्ण समर्पण के बाद प्रतिफल रूपेण नवनिर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।
🙈 मैं उच्छृंकल वाचाल बंदर और नकेल कसने हेतु मदारी के रूप में जीवन में 🌞 Shri LB Singh बाबूजी का आगमन और परिपाटी पंचकोश साधना की …..
🙏 ध्यान ने – भीतर झांकना प्रारंभ किया और @LBSingh बाबूजी की मंत्र दीक्षा आत्मसुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है ने मन को अभेद कवच प्रदान की और प्रज्ञोपनिषद् के ऋषि याज्ञवल्क्य जी के ऋषि चिंतन से सायुज्यता सहज लगी।
🙏 वर्तमान में ध्यान ने – ईश्वरीय अनुशासन में ईश्वर के सहचर बन जीवन की हर एक क्रिया के संपादन/ निष्पादन को अपना केंद्र बिंदु बना रखा है; और नि:संदेह यह गुरूदेव @ आप सभी दिव्य आत्माओं @ चराचर जगत @ ब्रह्म का स्नेह – आशीष है ….
🙏 क्रमशः – जय युग ऋषि श्रीराम 🕉
🙏 हर साधक को इष्टदेव चुन लेना चाहिए:-
👉 इष्टदेव चुनना अर्थात् जीवन का प्रधान लक्ष्य निर्धारित करना @ एकाग्रता।
👉 इष्टदेव उपासना का अर्थ है- उस लक्ष्य में अपनी मानसिक चेतना को तन्मय कर देना। इस तन्मयता से साधक के मन की बिखरी हुई शक्तियाँ एक बिन्दु पर एकत्रित हो साधक के गुण, स्वभाव, विचार उपाय एवं काम को अद्भुत गति से बढ़ाते हैं, जो लक्ष्य स्वरूप हो जाते हैं। इसी को इष्ट सिद्धि कहते हैं।
💡 “ध्यान-योग = मन की एकाग्रता + इष्ट सिद्धि” … जैसी योगस्थिति उत्पन्न करने का पुरुषार्थ किया जाता है।
🙏 आत्मपूजोपनिषद् – ॐ तस्य निश्चिन्तनं ध्यानम्। @ तत्सवितुर्वरेण्यं @ ध्यान-योग के 5 अंग हैं:-
1. स्थिति – साधक की स्थिति @ निशचलज्ञानमासनम् @ स्थिर शरीर व शांत मन
2. संस्थिति – इष्ट की छवि का मानस पटल पर निर्धारण @ समुन्मनीभाव: पाद्यम @ सदामनस्कमर्घ्यम …
3. विगति – इष्ट के गुणों को जानना @ जप (चिंतन – मनन) @ ईश्वर आदर्शों के समुच्चय हैं @ उस प्राण स्वरूप, दुःख नाशक, सुख स्वरूप … @ नियामक, समदर्शी, दीनबंधु – दीनानाथ, करूणानिधि, सत्यम् – शिवं – सुंदरं ….. – जो हैं एक @ एकं ब्रह्म द्वितीयो नास्ति किंतु अपने शक्ति धाराओं के अनुरूप विभिन्न नामों से जाने जाते हैं @ सर्व खल्विदं ब्रह्म। इनका एकाक्षर नाम ॐ सहज प्रतीत हुआ।
4. प्रगति – मन में रहने वाली भावना – आत्मीयता, श्रद्धा, निष्ठा, समर्पण।
5. सस्मिति – आत्म सत्ता का परमात्म सत्ता में विलय @ शिष्य व गुरू – एक @ साधक व साध्य – एक @ सविता व साधक – एक @ उपासक व उपास्य – एक @ अभेद दर्शनं ज्ञानं … क्रमशः 🕉