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Pragyopnishad – Pratham Mandal

Pragyopnishad – Pratham Mandal

PANCHKOSH SADHNA – Online Global Class – 19 Dec 2020 (5:00 am to 06:30 am) – Pragyakunj Sasaram _ प्रशिक्षक श्री लाल बिहारी सिंह

ॐ भूर्भुवः स्‍वः तत्‍सवितुर्वरेण्‍यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्‌|

Please refer to the video uploaded on youtube. https://youtu.be/lXYgjPRojT8

sᴜʙᴊᴇᴄᴛ: प्रज्ञोपनिषद् (प्रथम मण्डल)

Broadcasting. आ॰ अमन जी

आ॰ अर्चना राठौर जी

प्रथम अध्याय: लोककल्याण जिज्ञासा प्रकरण
‘नारद’ जी का जीवनोद्देश्य ‘लोककल्याण’ होने की वजह से उन्हें भगवान की विशेष अनुकंपा प्राप्त हुई।
‘अचिंत्य चिंतन’ व ‘अनुपयुक्त आचरण’ ही रोग, शोक, कलह, क्लेश, भय व विनाश का मूल है।
मनुष्य की ‘वरिष्ठता’ – ‘श्रद्धा’ (सद्भावना – अंतःकरण से प्रस्फुटित होने वाला आदर्शों के प्रति प्रेम), ‘प्रज्ञा’ (सद्ज्ञान) व ‘निष्ठा’ (सत्कर्म) पर अवलंबित है। वस्तुतः तीनों ही परस्पर पूरक हैं। सद्भावना से ही सद्ज्ञान एवं ज्ञान ही तो कर्म में परिणत होते हैं। ‘तत्त्व’ चिन्तन से प्रज्ञा जागती है। ‘प्रज्ञावान’ ‘आत्मनिर्माणी’ होते हैं और आत्मनिर्माणी ही ‘विश्वनिर्माणी’ हो सकते हैं। ‘सत्पात्रों’ को गायत्री महाविद्या का ‘अमृत’ (वेदमाता से ब्रह्मज्ञान), ‘पारस’ (विश्वमाता से भावना/प्रेम) व ‘कल्पवृक्ष’ (देवमाता से तपोबल/ देवत्व) रूपी तत्त्वज्ञान की उपलब्धि अनिवार्य रखी है ताकि वो ‘प्रेरणा’ के ‘धारक’ व ‘स्रोत’ दोनों बन सके। ‘ज्ञान’ व ‘कर्म’ के समन्वय से ही ‘समग्रता’ उत्पन्न होती हैं। ‘महाप्रज्ञा’ को अध्यात्म की भाषा में ‘गायत्री’ कहते हैं। इसके दो पक्ष हैं ~ १. दर्शन/ तत्त्व चिंतन/ अध्यात्म व २. व्यवहार/ शालीनता युक्त आचरण – धर्म। युगपरिवर्तन में ‘अवांछनीयता की गलाई’ व ‘सदाशयता की ढलाई’ होगी। ‘प्रज्ञावान्’ को आत्मीयता, लोक सम्मान व दैवीय अनुकम्पा की उपलब्धि होती हैं।

द्वित्तीय अध्याय: अध्यात्म दर्शन प्रकरण
‘आत्मज्ञान’ ही मनुष्य का सबसे बड़ा गौरव है। जो ‘आत्मस्वरूप’ को भूलते हैं व ‘उत्तरदायित्वों’ (responsibilities) को भूलते हैं वो पतन के गर्त में गिरते हैं। ‘जीवन’ प्रत्यक्ष देवता हैं। “मनुष्य अपने भाग्य का विधाता आप है” – सोते रहना ही ‘कलियुग’ है, जागने के बाद जम्हाई लेना ‘द्वापर’ है, उठ पड़ना ही ‘त्रेता’ है, उठकर अपने लक्ष्य के लिए गतिशील हो जाना ही ‘सतयुग’ है अतः ‘उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’।
‘ब्रह्मविद्या’ वह विज्ञान है जिसके अंतर्गत ‘परमात्मा’ के अंशरूप में विद्यमान ‘आत्मसत्ता’ की महत्ता को समझा, उभारा व विकसित किया जाता है। ‘साधना’ एक पराक्रम है, संघर्ष है, जो स्वयं की ही दुष्प्रवृत्तियों से करना होता है। ‘आत्मसमीक्षा – आत्मसुधार – आत्मनिर्माण – आत्मविकास’। अंतरंग परिष्कृत व बहिरंग सुव्यवस्थित ‘अध्यात्म’ की समग्रता है।

तृतीय अध्याय: अजस्र अनुदान उपलब्धि प्रकरण
उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समुच्चय ही ‘परमात्मा’ हैं। परमात्मा उनसे ही जुड़ते हैं जो उनके ‘अनुरूप’ हैं। अनुरूप – अनुकूलता को ही ‘पात्रता’ कहते हैं। पात्रता विकसित करने के लिए ही उपासना, साधना का विधान है। ‘पात्रता’ अर्थात् वह गठबन्धन जो आत्मसत्ता को परमात्म सत्ता से जोड़कर आदान-प्रदान का क्रम आरंभ कर देती है।
‘उपासना’ अर्थात् समीपता ऐसी की जीवन में ईश्वर घूल जायें, ‘साधना’ अर्थात् जीवन साधना – आत्मनिरीक्षण, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण व आत्मविकास एवं ‘अराधना’ अर्थात् लोक-मंगल, लोकसेवा।

आ॰ किरण चावला जी (USA)

चतुर्थ अध्याय: संयमशीलता – कर्तव्यपरायणता प्रकरण
मनुष्य का जीवन स्वयं ही प्रत्यक्ष देवता हैं। ‘संयम’ को ही ‘संपदा’ संज्ञा से अभिव्यक्त किया गया है। जीवन संपदा के ४ क्षेत्र हैं – १. इन्द्रिय शक्ति, २. समय शक्ति, ३. विचार शक्ति व ४. साधन शक्ति। प्रथम तीन ईश्वर प्रदत्त हैं चौथी को इन तीनों के संयुक्त प्रयास अर्थात् अपनी पात्रता से अर्जित करनी होती है। ‘इन्द्रिय-संयम’ हमें ओजस्वी, तेजस्वी बनाती हैं। ‘समय-संयम’ – व्यस्त रहें किंतु अस्त-व्यस्त ना रहें। ‘विचार-संयम’ से हम अचिंत्य चिंतन को रोक सकते हैं। ‘विचार’ सुक्ष्म स्तर के ‘कर्म’ हैं। ‘कार्य’ का मूल रूप विचार है। ‘अर्थ-संयम’ परिश्रम एवं मनोयोग का प्रत्यक्ष फल धन है जिसका सुनियोजन/ सदुपयोग अर्थ संयम है। उच्च उद्देश्यों से जुड़े हुए कर्तव्यपालन का दूसरा नाम ‘कर्मयोग’ है। शारीरिक स्वास्थ्य, संतुलित मनःस्थिति व कर्तव्यपालन – कर्मयोगी के आधारभूत लक्षण हैं।

पंचम अध्याय: उदार भक्ति भावना प्रकरण
अध्यात्मिक विकास में सर्वप्रथम भूमिका ‘आत्म-ज्ञान’ की होती है। वह आत्मज्ञान ही है जिसकी वजह से हमें अपना स्वरूप, कर्तव्य और भविष्य दृष्टिगोचर होता है।
अध्यात्मिक प्रगति का दूसरा सोपान है ‘कर्म’ अर्थात् कर्मयोग/ कर्मनिष्ठा। उच्च उद्देश्यों से जुड़े कर्तव्यपालन में निरत मनुष्य विश्वंभर कहलाते हैं। ‘भक्ति’ का अर्थ है – ‘श्रेष्ठता’ से प्रगाढ़ स्नेह। भक्ति – ‘उदार आत्मीयता’ व ‘आदर्शवादिता’ से ओत-प्रोत होती हैं। ज्ञान व कर्म के संगम से ‘भक्ति’ का उभार आता है। ‘ज्ञान, कर्म व भक्ति’ के त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाकर ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है @ ‘आत्मवत्सर्वभूतेषु’ व ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’।

षष्ठम अध्याय : सत्साहस संघर्ष प्रकरण
‘अनीति’ का प्रतिरोध ‘नीति’ समर्थन का एक पक्ष है तथा इसका भी एक निश्चित महत्व है। रात्रि से दिन का महत्व है, बुराई से अच्छाई का महत्व है, विनाश से उत्पत्ति का महत्व है … अतः ‘अवांछनीयता’ का भी एक अपना महत्व है।
‘पराक्रम’ मनुष्य का महत्वपूर्ण गुण है जिसे ‘संघर्ष’ के द्वारा उभारा जाता है। ‘जागरूकता’ (awareness), ‘तत्परता’ (readiness) व ‘प्रखरता’ (intelligence) – ये तीनों गुण न्याय के समर्थन में अन्याय से जुझने से आती है। 3 देवता – ‘ज्ञान, कर्म व औदार्य’ एवं 3 असुर – ‘अज्ञान, अभाव व अन्याय’ इनके बीच ‘संघर्ष’ (देवासुर संग्राम) चलता रहता है। अन्याय करने वाले से बड़ा दोषी – अन्याय को सहने वाला अथवा उस अन्याय को मूक दर्शक की भांति देखने वाला होता है। विवेक युक्त परामर्श सदैव सर्वथा मानने के योग्य है। गुरूदेव कहते हैं ‘हम परंपराओं के जगह विवेक को महत्व देंगे’।

सप्तम अध्याय: युगान्तरीय चेतना – लीलासन्दोह प्रकरण
महाकाल के आमंत्रण पर समष्टि चेतना के वाहक जिस रूप में प्रकट होते हैं उन्हें ‘देवमानव’ अग्रदूत प्रज्ञा पूत्र/ पूत्री के नाम से संबोधित किया जाता है।
… सत्प्रवृत्ति- संवर्द्धनाय, दुष्प्रवृत्ति- उन्मूलनाय, लोककल्याणाय, आत्मकल्याणाय, वातावरण -परिष्काराय, उज्ज्वलभविष्यकामनापूर्तये च प्रबलपुरुषार्थं … ।
जीवन-देवता‘ आराधना के चार आधारभूत स्तंभ : समझदारी (IQ), जिम्मेदारी (PQ), ईमानदारी (EQ) व बहादूरी (SQ)।

प्रश्नोत्तरी सेशन विद श्रद्धेय लाल बिहारी बाबूजी

🙏 हर युग की परिस्थितियों के अनुसार चुनौतियां होती है और ईश्वरीय आदर्शों का क्रम चलता है उनके समाधान के रूप में। ‘प्रज्ञोपनिषद्‘ को हम आज की युग-गीता कह सकते हैं जिसमें आज के सारे अर्जुनों के प्रश्नों/ जिज्ञासा/ चुनौतियां के समाधान हैं। ‘अचिंत्य चिंतन’ और ‘अनुपयुक्त आचरण’ से सृष्टि व्यवस्था में असंतुलन (क्लेश कलह, शोक, भय, विनाश) उत्पन्न हो गई है जिसके समाधान क्रम – ‘हिमालय’ में ऋषियों के conference में प्रश्नोत्तरी/ जिज्ञासा समाधान के माध्यम से विश्व वसुधा को मार्गदर्शन दिया जा रहा है। ‘उपासना, साधना व अराधना’ की सार्वभौम व्याख्या, practical (प्रयोग) एवं उसके application (अनुप्रयोग) के क्रम को साथ ही साथ उनकी उपलब्धियों को बताया गया है। ‘ज्ञान’ व ‘कर्म’ की महत्ता को बताते हुए उनकी समग्रता उनके संगम ‘भक्ति’ में सन्निहित है उसे भी सुबोध बनाया गया है।

सफलता में ‘सत्,साहस, व संघर्ष’/औदार्य/सुषुम्ना की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। त्याग/ बलिदान/ समर्पण/ विलय/ विसर्जन/शहीद – ससीम से असीम अर्थात् विस्तार में समग्रता प्रदान करते हैं।

सज्जनता + कर्मठता = पराक्रम। बहादुरी में शालीनता का समावेश हो। मनुष्य का प्रथम गुण पराक्रम है जिसकी जननी/माता – ‘संघर्ष’ है। गायत्री साधना + सावित्री साधना = गायत्री पंचकोशी साधना ~ समग्र साधना।

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।

Writer: Vishnu Anand

 

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