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Scientific and Spiritual Aspects of Yogasana

Scientific and Spiritual Aspects of Yogasana

PANCHKOSH SADHNA – Online Global Class – 14 Nov 2020 (5:00 am to 06:30 am) – Pragyakunj Sasaram – प्रशिक्षक Shri Lal Bihari Singh

ॐ भूर्भुवः स्‍वः तत्‍सवितुर्वरेण्‍यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्‌|

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sᴜʙᴊᴇᴄᴛ: आसन का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक पक्ष

Broadcasting. आ॰ अमन जी

योग शिक्षक आ॰ सुरेन्द्र पटेल जी (Research Scholar, पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार)

आसन‘ जीवन का अनिवार्य अंग। वर्तमान परिदृश्य में जनमानस द्वारा आसन को शरीर को तोड़ना – मरोरना/ नटों का खेल मात्र समझा जाने लगा है।
महर्षि पतंजलि कहते हैं ‘स्थिरसुखमासनम‘ अर्थात् जिस posture में हम स्थिर व सुखपूर्वक रहें वो आसन है। आसन का उद्देश्य ‘चित्त’ की स्थिरता व सुख/ निरोगी जीवन है। अतः आसन के अभ्यास में क्रिया पक्ष i.e. शरीर में ‘लोच’ (flexibility) की अभिवृद्धि के साथ ही साथ ‘योग पक्ष’ i.e. चित्त की स्थिरता @ योगश्चचित्तवृद्धिनिरोधः का ध्यान रखना आवश्यक है। ‘क्रियायोग’ में क्रिया पक्ष की आत्मा – योग है। ‘साधना’ में प्राण आ जाये तो कमाल हो जाए

Demonstration. आ॰ भैया द्वारा निम्नांकित आसनों का demo alongwith de-briefing:-

  1. अस्थि संचालन (joint movements),
  2. प्रज्ञा-योगासन,
  3. त्रिबंधात्मक नाड़ी-शोधन सह भस्रिका प्राणायाम
  4. “महामुद्रा + महाबंध + महाबेध” – trio together – श्री लाल बिहारी बाबूजी का एक शोध जिसका प्रभाव पंचकोश को उज्जवल बनाने में अतीव है।
  5. हलासन, सर्वांगासन, भुजंगासन, मयुरासन
    ‘आसन’ का प्रभाव मर्म बिन्दुओं पर होता है अतः अभ्यास के क्रिया पक्ष के साथ ध्यान पक्ष – भाव रूपेण प्राणाकर्षण अर्थात् cleaning व healing साथ साथ चलती है। ‘मर्म’ शरीर के वे बिंदु हैं जहाँ प्राणों का वास होता है। यहां प्राणों की कमी – आधि व्याधि व मृत्यु तुल्य कष्टदायक स्थिति उत्पन्न करती हैं।
    Note: अभ्यास में सहजता व रूचि का ध्यान रखना अनिवार्य रखें। अभ्यास का उद्देश्य चित्त की स्थिरता व निरोगी काया है। उत्साह का अतिरेक कष्ट का कारण बन सकता है।

मूलबंध, अश्वनि मुद्रा, ब्रजोली मुद्रा आदि के अभ्यास में भावनाओं का क्रम बदलता है। दैनंदिन जीवन में ‘आहार‘ में गुरूदेव के सुत्र “ऋतभोक्, मितभोक् व हितभोक्” का ध्यान रखें। भोजन खुब चबा चबा कर खाएं व घूंट घूंट पानी पीयें। ‘विहार‘ में प्राकृतिक जीवनशैली रखें।

Q&A with श्री लाल बिहारी बाबूजी

स्थिरसुखमासनम्‘ अर्थात् आसन के अभ्यास का उद्देश्य जीवन की स्थिरता @ ‘अच्युत’ है। यह तब संभव होता है जब संसार के परिवर्तनशील सत्ता में आधारभूत उस अपरिवर्तनशील चैतन्य सत्ता से तादातम्यता/सायुज्यता स्थापित कर ली जाए। जिसके लिए पंचकोश अनावरण/ पंचकोश का उज्जवल बनाना अनिवार्य है। पंचकोश साधना में हर एक कोश के अनावरण (उज्जवल/ cleaning & healing) हेतु अलग-अलग ‘आसन’ (क्रियायोग) हैं।

मूलबंध‘ का प्रभाव अपान व कूर्म दोनों पर होता है। वे जिन तन्तुओं पर फैले रहते हैं उनका संकुचन होने से शक्ति का बिखराव रूककर केन्द्रीकरण होता है। मूलाधार स्थित ‘कुण्डलिनी शक्ति’ में चैतन्यता उत्पन्न होती है। गुदा (anus) को संकुचित करने से ‘अपान’ स्थिर रहता है। वीर्य की गति उर्ध्व अर्थात् ‘प्राण’ का उर्ध्वगमन होता है। आंत बलवान होती है कब्ज नहीं होता है।

चेतना‘ की कोई anatomy नहीं होती है। अतः ध्यान के भाव पक्ष में अपनी सहजता का ध्यान रखें @ ‘गायत्री वा इदं सर्वं’। आंख न मूंदौं कान न रूंधौं, तनिक कष्ट नहिं धारौं। खुले नैन पहिचानौं हंसि-हंसि, सुंदर रूप निहारौं।

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।

Writer: Vishnu Anand

 

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