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Scientific Aspects of Spiritual Sex Element – 2

Scientific Aspects of Spiritual Sex Element – 2

PANCHKOSH SADHNA – Online Global Class – 13 Dec 2020 (5:00 am to 06:30 am) – Pragyakunj Sasaram _ प्रशिक्षक श्री लाल बिहारी सिंह

ॐ भूर्भुवः स्‍वः तत्‍सवितुर्वरेण्‍यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्‌|

Please refer to the video uploaded on youtube. https://youtu.be/vDg3b4d03QE

sᴜʙᴊᴇᴄᴛ: उत्तेजित काम क्रीड़ा से प्राण शक्ति का क्षरण

Broadcasting. आ॰ अंकुर जी

श्रद्धेय लाल बिहारी बाबूजी

पूज्य गुरूदेव की लेखनी के हर एक ‘अक्षर’ विश्व वसुधा के लिए ‘सदुपयोगी’ (useful/ helpful/ practical) हैं।

काम शक्ति (मूलाधार) :-
मर्यादित’ हों – ‘ओजस् (बल), तेजस (विद्या), व वर्चस (संस्कार)’ में रूपांतरित हो जाता है। ‘नर’ व ‘नारी’ शक्ति के घनिष्ठ सहयोग से ‘घर बसाने से लेकर, व्यक्तित्व विकास और सामाजिक प्रगति’ का माध्यम बन जाता है। और
अमर्यादित‘ हों – ‘प्राण’ {‘ओजस् (शारीरिक बल), तेजस् (मनोबल) व वर्चस (आत्मबल)’} क्षरण का माध्यम बन यह मनुष्य को दीन हीन पतित पापी बनाता चला जाता है।

उत्तेजित काम क्रीड़ा से:-
नर व नारी के बीच का सौजन्य चला गया और एक दूसरे के लिए अहितकर बन गये।
यौन रोगों की बाढ़ आ गई, ‘शरीर’ व मन जर्जर हो गया फलस्वरूप पीढ़ी दर पीढ़ी दुर्बलतर होती जा रही हैं।
मनःशक्ति उस कुचेष्टा में तल्लीन होने की वजह से सार्थक चिंतन करने में असमर्थ हो गयी।

मरणं बिन्दु पातेन जीवनं बिन्दु धारणात्‘ – ‘वीर्य’ को अंगिरस भी कहा जाता है। भारतीय ऋषि परंपरा ने ‘विवाह’ व्यवस्था की परंपरा रखी। ‘विवाह’ अर्थात् पवित्र मिलन – एक-दूसरे के चरित्र की रक्षा-विशेषताओं का मिलजुलकर रचनात्मक दिशा में सदुपयोग करना है। कुण्डलिनी गह्वर – जननेन्द्रिय (genitals) मूल में समाहित शक्ति भण्डार को ऊर्ध्वरेता (upward) होना चाहिए, ताकि उस स्नेह के पोषण से बुद्धिमत्ता का दीपक (प्रज्ञा) प्रदीप्त रह सके। जो इस तथ्य की उपेक्षा करते व काम-सेवन में अतिवाद बरतते हैं, वे अपनी मेधा, समर्थता और स्वास्थ्य सन्तुलन को बेहिसाब गँवाते हैं।

साधना से सिद्धि‘ हेतु ‘मनोमयकोश’ की शुद्धि अनिवार्यता है। काम शक्ति/ मूल उर्जा के उर्ध्वगमन के लिए ‘तन्मात्रा साधना’ महत्त्वपूर्ण है। जो भी आकर्षण विकर्षण हैं उसका मूल 5 तत्त्वों के सुक्ष्म गुण 5 तन्मात्रायें ‘शब्द, रूप, रस, गंध व स्पर्श हैं जिसकी अनुभूति का माध्यम 5 ज्ञानेन्द्रियां व क्रियान्यवयन का माध्यम 5 कर्मेन्द्रियां हैं। 5 तन्मात्रायें/ विषयों के प्रति 11th इन्द्रिय ‘मन’ संकल्प विकल्प करता है आसक्त होता है चिपकाव रखता है। जिसकी अनुभूति/ स्मृति/ चित्रण – ‘चित्त’ है। अतः विशुद्ध चित्त/ प्रज्ञा-जागरण हेतु तन्मात्रा साधना की सिद्धि की अनिवार्यता प्रतीत होती हैं।

वज्रोली मुद्रा‘ के अभ्यास से वीर्य अथवा उसमें सन्निहित प्राण (ओजस्) के क्षरण के practical को बाबूजी ने समझाया है।

हम काम-सेवन की मर्यादा समझे एवं ऊर्ध्व रेता बनकर अपनी शक्ति उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लगाये।

प्रश्नोत्तरी सेशन

काम‘ का अर्थ केवल मैथुन मात्र नहीं वरन् सृजन, उल्लास, उत्साह, उमंग, व्यक्तित्व विकास, प्रतिभा विकास अर्थात् जीवन में सरसता उद्भव है। मानव जीवन के 4 आधार – ‘धर्म’ (ज्ञान), ‘अर्थ’ (शक्ति) को सिद्ध करने के बाद ‘काम’ (सरसता) का उद्भव और यह मोक्ष का साधन हैं क्योंकि इसके बाद ही ‘मोक्ष’ की स्थिति हैं।

सतोगुणी हर्बल प्लान्ट्स से शरीर में heat को भी बनाए रखता है, वीर्य में अभिवृद्धि करता है व कामोत्तेजना को भी नहीं बढ़ाता है। तप व योग की समन्वित प्रक्रिया भी ‘वीर्य’ (ओजस्, तेजस् व वर्चस) में अभिवृद्धि करता है।

मर्यादित काम-क्रीड़ा को सर्वांगीण जीवन क्रम में :-
‘जोश’ व ‘होश’ का संगम,
‘मूलाधार’ व ‘सहस्रार’ का मिलन
‘ज्ञान’ व ‘क्रिया’ का समन्वय,
‘गायत्री’ व ‘सावित्री’ का समन्वय,
‘तप’ व ‘योग’ का समन्वित क्रम
जीवन में ‘उत्कृष्ट चिंतन’ + ‘सदुपयोग’ का संगम सुख समृद्धि समरसता,
‘इड़ा’ व ‘पिंगला’ का संगम ‘सुषुम्ना’
‘शिव’ व ‘शक्ति’ का मिलन।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से नर व नारी में शरीरगत व जातिगत भेद नहीं है। अध्यात्म में भेद कहां @ गायत्री वा इदं सर्वं। विवेचन मात्र केवल यह है की दो शक्ति धाराओं का मिलन जो सरसता पूर्ण अखंड आनंदमय अवस्था प्रदायिनी हैं।

ऋषि दंपत्ति सृष्टि क्रम व्यवस्था को बनाए रखने हेतु संभोग अर्थात् प्रजापति यज्ञ करते हैं। उसमें आसक्त नहीं होते अर्थात् उसमें ‘लोभ, मोह व अहंकार’ का समावेश नहीं रहता है। ‘मिलन’ का उद्देश्य उत्साह, उमंग, स्नेह, सौजन्य, समानता, व्यक्तित्व विकास, सामाजिक विकास व आध्यात्मिक विकास अर्थात् जीवन में समग्र उन्नति हेतु है। सोद्देश्य आध्यात्मिक मिलन – सार्थक है @ शरीर भले दो हों किंतु आत्मा एक।

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।

Writer: Vishnu Anand

 

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