
Shvetashvatara Upanishad – 4
PANCHKOSH SADHNA – Navratri Sadhna Special Online Global Class – 10 Oct 2021 (5:00 am to 06:30 am) – Pragyakunj Sasaram _ प्रशिक्षक श्री लाल बिहारी सिंह
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।
SUBJECT: श्वेताश्वतरोपनिषद्-4
Broadcasting: आ॰ अंकूर जी/ आ॰ अमन जी/ आ॰ नितिन जी
टीका वाचन: आ॰ किरण चावला जी (USA)
श्रद्धेय श्री लाल बिहारी सिंह (बाबूजी)
नवरात्रि का चतुर्थ दिन और आज श्वेताश्वतर उपनिषद् का चतुर्थ अध्याय। हमने अब तक यह जाना कि परब्रह्म परमात्मा की अनुभूति ध्यान-योग के द्वारा ही की जा सकती है। ध्यान-योग के लिए मन का शुद्ध होने (शांत, सतेज व प्रसन्न) की अनिवार्यता है।
‘आसन‘ से शरीर में लोचकता (flexibility) आती हैं और अन्य क्रियायोग के लिए पर्याप्त शक्ति – सामर्थ्य भी। इसकी सिद्धि में आहार संयम का मुख्य योगदान है।
‘प्राणायाम, बंध व मुद्रा‘ के प्रयोग से प्राण शक्ति के आकर्षण, क्षरण को रोकना, धारण व संवर्धन आदि किया जाता है।
‘ध्यान-योग‘ में आत्मपरिष्कार (आत्मसमीक्षा + आत्मसुधार + आत्मनिर्माण + आत्मविकास), स्वाध्याय, सत्संग, ईश्वर प्राणिधान आदि से एकत्व (अद्वैत) की साधना की जाती है।
चतुर्थ अध्याय में में अद्वैत/ एकत्व/ अभिन्नता (no difference) का पाठ/ शिक्षण है।
जो सृष्टि के आरम्भ में अकेले ही वर्ण से रहित होकर और बिना किसी प्रयोजन के अपनी विविध शक्तियों के प्रयोग द्वारा अनेक रूप धारण कर लेता है और अन्त में सम्पूर्ण विश्व को अपने में ही विलीन कर लेता है, वह परमात्मा हमें शुभ बुद्धि से संयुक्त करे ॥1॥
आनंद की स्फुरणा – एकोऽहमबहुस्याम्। धियो – सद्बुद्धि।
वही अग्नि है, वही सूर्य, वायु तथा चन्द्रमा है । वही शुक्र है , वही ब्रह्म, वही आपः है और वही प्रजापति है ॥2॥
सार्वभौमिकता।
आप ही स्त्री और आप ही पुरुष हैं । आप ही पुत्र अथवा पुत्री हैं, आप ही वृद्ध होकर लाठी के सहारे चलते हैं तथा तथा जन्म लेकर सर्वत्र विविध रूपों में विद्यमान हैं ॥3॥
सभी व्यक्तित्व में समाहित चेतन सत्ता।
आप ही नीलवर्ण, पतंग, हरितवर्ण, लाल आँखों वाला, मेघ, ऋतुएं तथा सप्त समुद्र हैं । आप ही अनादि सत्ता वाले और सर्वत्र विद्यमान हैं, आपसे ही सम्पूर्ण लोक उत्पन्न हुए हैं ॥4॥
सर्वव्यापक सृजनक।
अपने अनुरूप बहुत सी प्रजाओं को उत्पन्न करने वाली लोहित, शुक्ल एवं कृष्ण वर्ण वाली ‘अनादि प्रकृति’ को एक ‘अज’ (जीव) स्वीकार करता हुआ भोगता है और दूसरा ‘अज’ (आत्मा) उस उपभुक्त प्रकृति का परित्याग कर देता है ॥5॥
त्रिगुणात्मक (सत्, रज व तम) प्रकृति, अनादि – ऊर्जा का कभी क्षय नहीं होता प्रत्युत् रूपांतरण होता है।
सदा संयुक्त रहकर मैत्री भाव से एक साथ रहने वाले दो पक्षी एक ही वृक्ष का आश्रय लिए हुए रहते हैं । उनमें से एक (जीवात्मा) तो उस वृक्ष के फलों (कर्मफलों) को स्वाद लेकर खाता है; किन्तु दूसरा (परमात्मा) उनका उपभोग न करता हुआ केवल देखता रहता है ॥6॥
2 पक्षी – (जीवात्मा व परमात्मा), वृक्ष – शरीर, जीवात्मा – कर्मफल का भोक्ता, स्वाद – आसक्ति, परमात्मा – अभोक्ता, अकर्ता, साक्षी चैतन्य।
उस एक ही वृक्ष पर रहने वाला जीव राग-द्वेष, आसक्ति आदि में डूबकर मोहित हुआ दीनतापूर्वक शोक करता है । जब वह अनेक साधनों द्वारा सेवित और अपने से भिन्न ईश्वर और उसकी महिमामयी सत्ता का साक्षात्कार करता है, तब वह शोक-संताप से मुक्त हो जाता है ॥7॥
आत्म – परमात्म साक्षात्कार से ही त्रिविध ताप/ दुःखों से मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति होती है। बोधत्व की यात्रा में सबसे बड़ी बाधा आसक्ति है।
जिसमें संपूर्ण देवगण अधिष्ठित हैं, उस अनश्वर परमव्योम में समस्त वेद स्थित हैं । जो उसे नहीं जानते, वे केवल ऋचाओं के द्वारा क्या कर लेंगे ? जो उसे जानते हैं, वे सम्यक रूप से उसी में कृतार्थ होकर स्थित हैं ॥8॥
वासुदेव – अर्थात् वह परमदेव जो सभी जगह वास करते हैं। गीताकार कहते हैं – बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।7.19।। भावार्थ: बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है॥
समस्त वेद, यज्ञ, ज्योतिष्टोम आदि विशिष्ट यज्ञ, व्रत, भूत, भविष्यत् तथा जो भी कुछ वेदों द्वारा वर्णित है, वह सब मायापति ईश्वर इस अक्षर से ही उत्पन्न करता है, और स्वयं जीवात्मा रूप में उस माया से भिन्न होकर भी उसके साथ भली-भांति जुड़ा हुआ है ॥9॥
अक्षर – अविनाशी प्रकृति तत्त्व । संसार की परिवर्तनशीलता में एक अपरिवर्तनशील ज्ञानयुक्त प्रकाश रूपी सत्ता विद्यमान है।
प्रकृति को तो माया समझना चाहिए और परब्रह्म महेश्वर को मायापति । उसी के अङ्गभूत से सम्पूर्ण जगत व्याप्त है ॥10॥
जो स्वयं अकेले ही प्रत्येक शरीर का अधिष्ठाता है, जिसमें यह संपूर्ण जगत प्रलयकाल में विलीन हो जाता है और सृजनकाल में विविध रूपों में पुनः प्रकट भी हो जाता है । साधक उस नियामक सत्ता, वर प्रदाता, स्तुत्य परमदेव को जानकर शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है ॥11॥
प्रत्येक शरीर – 84 लाख योनि।
जो रुद्रदेव, अन्यान्य देवों की उत्पत्ति के हेतु और ऐश्वर्यादि से उनका परिपोषण करने वाले हैं, जो सबके अधिपति और सर्वज्ञाता हैं । जिनने हिरण्यगर्भ को उत्पन्न होते देखा था, वे देव हमें निर्मल बुद्धि से संयुक्त करे ॥12॥
जो समस्त देवों के अधिपति हैं, जिसमें सम्पूर्ण लोक अधिष्ठित हैं, जो इस दो पैर वाले एवं चार पैर वाले समस्त जीव समूह के नियन्ता हैं, उन ‘क’ संज्ञक प्रजापति का हम हम हविष्यान्न आदि द्वारा पूजन करें ॥13॥
सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म, हृदयगुहा के गुह्यस्थान में स्थित, सम्पूर्ण जगत के रचयिता, अनेकरूप धारण करने वाले, सम्पूर्ण जगत को अकेले ही परिव्याप्त करने वाले कल्याणकारी देव को जानकर शाश्वत शान्ति को प्राप्त करता है ॥14॥
वही प्रत्येक काल में समस्त लोकों का रक्षक, सम्पूर्ण जगत का स्वामी और समस्त प्राणियों में स्थित है । जिसमें ब्रह्मर्षि और देवगण भी ध्यान द्वारा तल्लीन रहते हैं, उस परमपुरुष जानकर साधक अपने मृत्यु के बन्धनों को काट डालता है ॥15।।
साधक घृत के समान ऊपर रहने वाले उसके सार भाग के समान अतिसूक्ष्म और समस्त प्राणियों में अधिष्ठित, कल्याणकारी देव को जानकर तथा उस संपूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड को अपनी सत्ता से घेर कर रखने वाले विराट देव को जानकर, संपूर्ण विकार रूपी बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥16॥
यह जगत कर्ता, देदीप्यमान परमात्मा सर्वदा मनुष्यों के हृदय में सम्यक् प्रकार से अवस्थित है । जो साधक अपने हृदय, बुद्धि और मन से ध्यान द्वारा योगयुक्त होकर इसे जान लेते हैं, वे अमरत्व पाते हैं ॥17॥
जब अज्ञान का तमस् नहीं रहता, तब न दिन रहता है न रात्रि और न सत् रहता है न असत्, एक कल्याणकारी देव रहता है । वह सर्वदा अनश्वर है, वह सविता देव का भी उपास्य है तथा उसी से पुरातन प्रकृष्ट ज्ञान निःसृत हुआ है ॥18॥
इसे न तो ऊपर से, न इधर-उधर से और न मध्य से ही कोई भली भांति पकड़ सकता है । जिसका नाम ‘महद्-यश:’ है, उसकी कोई उपमा भी नहीं है ॥19॥
इस परमात्मा का कोई रूप दृष्टि के सामने नहीं ठहर पाता, उसे कोई इन आंखों से नहीं देख सकता । जो साधक अपने हृदय में अवस्थित परमात्मा को भावपूर्ण हृदय और निर्मल मन से जान लेते हैं, वे अमरत्व प्राप्त कर लेते हैं ॥20॥
हे रुद्रदेव ! आप जन्म-मृत्यु के चरण से मुक्त हैं, ऐसा जानकर कोई भीरु आपके आश्रय में आता है, आप अपने कल्याणकारी रूप से मेरी सर्वदा रक्षा करें ॥21॥
हे रुद्रदेव ! हम विविध हविष्यान्न लेकर सदैव आपका आवाहन करते हैं। आप कुपित होकर हमारे वीर पुरुषों का नाश ना करें । न हमारे पुत्रों में, न पौत्रों में, न हमारी आयु में, न हमारी गौओं में और न हमारे अश्वों में कोई कमी करें ॥22॥
जिज्ञासा समाधान
प्रज्ञा – जिस बुद्धि से एकत्व का मार्ग प्रशस्त होता है। गुरू वह हैं जो अद्वैत (अभिन्नता) का मार्ग प्रशस्त करें। शिव व शक्ति @ मूलाधार व सहस्रार के मिलन से एकत्व का मार्ग प्रशस्त होता है।
जब तक एकत्व/ अभिन्नता/अद्वैत का साक्षात्कार/ बोधत्व ना हो तब तक हम जीवात्मा।
इष्ट देव के प्रति श्रद्धा-विश्वास, निष्ठा होती है। श्रद्धा-विश्वास, प्रज्ञा व निष्ठा संग उस विराट की ‘उपासना, साधना व अराधना’ की जाती है। गीताकार कहते हैं – येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता: । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ।।9/23।।
गीताकार कहते हैं – त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ।।2-45।। भावार्थ: हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं। इसलिये तू उन भोगों एवं उनके साधनों, आसक्ति हीन, हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से रहित, नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित योगक्षेम को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्त:करण वाला हो ॥
त्रिगुणात्मक संतुलन (विज्ञानमयकोश – ग्रन्थि भेदन साधना) से निर्द्वन्द साक्षी भाव में रहा जा सकता है।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।
Writer: Vishnu Anand
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